09 June 2005

पाठकों के पत्र

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{कहते हैं कि किसी रचनाकार को उसके पाठक महान बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। रचनाकार की किसी रचना को पढ़कर जब एक अपरिचित पाठक पत्र लिख देता है तो रचनाकार को अपरिमित ऊर्जा मिलती है, उसे और अच्छा साहित्य सृजन की प्रेरणा मिलती है। सरल जी ने भी उतने बड़े अपने साहित्य संसार की सृजन प्रक्रिया में पाठकों के पत्रों की प्रेरणा को स्वीकारा है।}
प्रस्तुत हैं सरल जी के लिए लिखे गए उनके पाठकों के पत्रों के कुछ संक्षिप्त अंश—

प्रतिक्रियाएँ
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  • सरदार भगतसिंह काव्य ग्रंथ मेरे बेटे के अनरूप ही हैं। इसकी प्रति प्राप्त कर लग रहा है जैसे मेरा बेटा भगतसिंह मेरी गोद में आ बैठा है।
  • -स्व०विद्यावती जी (शहीद भगत सिंह की पूज्य माता) खटकरकलां जालधंर ( पंजाब)
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  • आपके भगत सिंह महाकाव्य को मैंने विशिष्ट स्थान देकर रामायण और गीता के बीच में रख छोड़ा है।
    -श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, सहारनपुर

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  • सरल जी ने महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वेदव्यास और गोस्वामी तुलसीदास की पंक्ति में अपना स्थान बना लिया है।
    -आचार्य दीपेन्द्र शर्मा, धार
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  • क्रान्ति–कथाएँ वास्तव में इस युग का महाग्रन्थ है। सरल जी की साधना और श्रम की जितनी प्रशंसा की जाय, कम है।
    -श्री विश्वंभर नाथ पाण्डेय, राज्यपाल–उड़ीसा
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  • आपकी कृतियों का मूल्यांकन तो इतिहास ही कर सकेगा। हम लोग तो वंदना ही कर सकते हैं।
    -श्री शंकरदयाल सिंह, सांसद दिल्ली
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  • सरल जी ने विश्व में सर्वाधिक महाकाव्य लिखे हैं।
    -डॉ॰ प्रभाकर माचवे, इन्दौर
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  • आपने क्रान्ति–कथाएँ लिखकर हमारी सारी विरादरी (विश्व–व्यापी) के साथ उपकार किया है। यह स्थायी कीर्ति है।
    -महान क्रान्तिकारी मन्मथनाथ गुप्त, हजरत निजामुद्दीन (नई दिल्ली)
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  • आपकी पुस्तकें पढ़ कर मेरे जीवन की दिशा ही बदल गई है।मैं बिगड़ा हुआ एक आदिवासी बालक था। मुझ में कई दुर्गुण थे। आपके साहित्य की प्रेरणा से मैंने सभी बुराई छोड़ दी और पढ़ाई के साथ मेहनत मजदूरी करके अपने परिवार वालोअ की सहायता भी करने लगा हूँ। आप अपनी नई पुस्तकें अवश्य भेजें।
    -नारायण लाल, शिवरी नारायण (म.प्र.)
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  • मैं आज कल आपकी पुस्तकें विशेष रूप से इसलिए पढ़ रही हूँ, जिससे मेरी होने वाली संतान क्रान्तिकारियों जैसी निडर और देश भक्त बने।
    -श्रीमती वार्ष्णेय,फिरोजाबाद (उ.प्र.)
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  • आपके साहित्य को पढ़ कर मैंने जीवन भर सेवा और त्याग का संकल्प लिया है। आप मुझे पुत्री तुल्य समझ कर मुझे दिशा दान देते रहिए। कभी उपस्थित होकर चरण वन्दन करने की लालसा है।
    -डॉ० रीता, बीकानेर - राजस्थान
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  • आपकी पुस्तक सुभाषचन्द्र का प्रारम्भिक भाग पढ़ा मेरी आँखों से निरन्तर आँसू बहते रहे । आपके प्रति मेरा मस्तक नत हो गया। मैं सिख परिवार से हूँ। मेरे पति इन्जीनियर हैं। मेरा एक ही पुत्र है। जब पढ़ने योग्य हो जायेगा तो मैं उसे आपका पूरा साहित्य पढ़ाऊँगी। आप मुझे अपनी बेटी के रूप मे स्वीकार करें तो मैं अपने आपको धन्य समझूँगी। मेरे पिताजी मुझे लिली कहकर पुकारते थे। आप भी लिली सम्बोधन से मुझे पत्र लिखा करें।
    -श्रीमती नरिन्दर कौर, राँची- (बिहार)
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  • बाबाजी ! मैंने कक्षा आठ की परीक्षा दी है। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है। आजकल मैं आपकी पुस्तक क्रान्ति कथाएँ, पढ़ रही हूँ। बाबाजी आपने कितने कष्ट झेलकर यह पुस्तक लिखी है। यदि आप जैसे चार–छह साहित्यकार हो जायँ तो इस देश का कल्याण हो जाय। मैंने तो आपके साहित्य से प्रेरणा लेकर अपना जीवन देश के लिए समर्पित करने का संकल्प कर लिया है। अपनी इस पौत्री पर कृपा बनाए रखें।
    -कु. रिम्पी, बीसलपुर - पीलीभीत ( उ.प्र.)
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  • बाबाजी ! जिस दिन धमतरी के कन्या–विद्यालय में, मैंने आपकी कविताएँ सुनी, तभी से आपके प्रति श्रद्धा से मन भर गया है। हम छात्राओं ने अपना एक क्लब बनाया है और हम लोग खोज–खोज कर राष्ट्रीय पुस्तकें ही पढ़ते हैं। आप जो कुछ नया, लिखें, वह हमें अवश्य भेजें।
    -कु. गीता परमार, बागबहरा - रायपुर (म.प्र.)
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  • मैंने आपका महाकाव्य भगतसिंह पढ़ा। इसे पाँच बार पढ़कर भी मन नहीं भरा। ऍसी पुस्तक तो विश्व–विद्यालय के पाठ्य–क्रम में सम्मिलित होना चाहिए। पता नहीं हमारे पाठ्य–क्रम निर्माता कब अपने स्वार्थों से ऊपर सही पुस्तकें छात्रों के हाथों में देगे।
    -नरेन्द्र छाबड़ा, नई दिल्ली
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  • आपका महान कृतित्व और हमारे देश के क्रान्तिकारी आन्दोलन का अप्रतिम स्मारक क्राति–कथाएँ देखने को मिला। इस चिर–स्मरणीय कार्य के लिए न केवल हम, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ीयाँ भी आपकी शुक्रगुजार रहेंगी। आप सौभाग्यशाली हैं कि आपके हाथों ऍसा महान कार्य सम्पन्न हुआ। इसमें आपकी जायदाद बिक गई, कोई बात नहीं। आपको ऍसी जयादाद मिल गई, जिसकी तुलना में फोर्ड और बिड़ले भिखारी नजर आएँगे।
    -शिव प्रकाश पचौरी, आगरा- (उ.प्र.)
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  • सरल–महाकाव्य –ग्रंथावली की गणना साहित्य के आशचर्यों में होगी।
    -डॉ० पी०बी०शर्मा, नई दिल्ली
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  • क्रान्ति–कथाएँ श्री सरल की अद्भुत कृति है। मैं लेखक के चरणों में अपना मस्तक झुकाता है।
    -डॉ॰ कृष्णचन्द्र गौड़, इलाहाबाद
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  • क्रान्ति कथाएँ लिखकर आपने इतना बड़ा काम कर डाला है, जो कई संस्थाएँ मिलकर भी नहीं कर सकती थीं। वास्तविक बात तो यह है कि प्राण–दान तक की स्थिति में आकर आप अपना काम कर डालते हैं। आप इतनी ऊँची छलाँग लगा जाते हैं कि आप इस बात की भी चिन्ता नहीं करते कि आप गिरेंगे कहाँ।
    -डॉ॰ जयन्ती प्रसाद मिश्रा, नई दिल्ली
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  • सरल जी का लेखन ऍतिहासिक दस्तावेज से कम नहीं है। वह नेता जी सुभाष और आज़ाद-हिन्द-फौज का स्थायी स्मारक सिद्ध होगा।
    -कर्नल जी॰एस॰ढिल्लन [आज़ाद-हिन्द-फौज] शिवपुरी - (म॰प्र॰)
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  • ज़माने ने हमें जिन्दा दफना दिया था। सरल जी ने हमें निकाला और अमर कर दिया है।
    -शेरे–हिन्द, सरदारे–जंग कैप्टन मनसुख लाल [आई॰एन॰ए॰] अलीगढ़ - (उ॰प्र॰)
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  • नेत्र ज्योति चली गई है। एक आँख के कोने से थोड़ा दिखाई देता है। उसी कोने से पुस्तक सटाकर पूरी पढ़ डाली है। सुभाष बाबू पर आपने जो कुछ लिखा है, वह नितान्त अनिवार्य था। मैं आपको देश के स्वतंन्त्रता–संग्राम का निर्भीक सेनानी, इतिहासकार और जाग्रत प्रहरी मानती हूँ। सरल जी! आप अपनी इस धुन को कायम रखें और इसी प्रकार आनन्द लेते और देते रहें।
    -महान क्रान्तिकारी दुर्गा भाभी, गाजियाबाद - (उ॰प्र॰)
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  • सरल जी जीवित शहीद हैं। उनकी साहित्य साधना तपस्या कोटि की साधना है।
    -महान क्रान्तिकारी स्व॰ पं॰ परमानंद, राठ - हमीरपुर - (उ॰प्र॰)
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  • सरलजी के क्रान्ति साहित्य का मैं उतना ही आदर करता हूँ जितना रामायण और गीता का।
    -महान क्रान्तिकारी डॉ० भगवानदास माहौर, झाँसी - (उ.प्र.)
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  • सरलजी ने देश और धरती का कर्ज उतार कर हमारी पीढ़ी पर कर्ज चढ़ा दिया है।
    -वीरेन्द्रनाथ पाण्डेय, देहरादून - (उत्तर प्रदेश)
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  • आपके राष्ट्रीय काव्य से मैं इतनी अधिक प्रभावित हुई हूँ कि आपका चित्र खोज कर मैंने उसे उस स्थान पर रखा है जहाँ भगवान जी रहते हैं।
    -कु० ज्योतिसिंह चौहान, मेहगाँव - भिण्ड - (म.प्र)
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  • सुना है आखों का आपरेशन कराने के लिए आपको अपना साहित्य बहुत सस्ते में बेचना पड़ रहा है। मेरा आग्रह है, आप एक आँख मेरी ले लीजिए।
    -अश्विनी शर्मा, जयपुर - राजस्थान
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  • अपनी उत्कृष्ट काव्य साधना और तप–त्याग मय जीवन के कारण सरलजी प्रातः स्मरणीय ही नहीं, क्षण-क्षण स्मरणीय हो गए हैं।
    -डॉ० जवाहरलाल चौरसिया "तरुण"
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  • राष्ट्र कवि प्रो०श्रीकृष्ण सरल राष्ट्रीय चेतना संपन्न विश्व कवियों में मूर्धन्य हैं।
    -डॉ०श्रीमती रमा चतुर्वेदी
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  • हिन्दी कवियों में राष्ट्र कवि प्रो० श्रीकृष्ण सरल अनन्वय अलंकार की भाँति समादृत हैं।
    -प्रो. डॉ० दिनेश दत्त चतुर्वेदी

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पीछे gg

1 comment:

Nikhil (An Enigma) said...

I congratulate everyone involved to start site on Shri Saral ji. I have as yet read only one of his mahakavya, Chandra shekhar azad. But it leaves on me a impression as if I have witnessed the whole life of this legendary personality.

I wish my best of luck to the workers and expess my wish to help them in sort if needed.

Regards and JAI HAIND,
Nikhil Bhouraskarr